Saturday, 21 March 2009

अब तो पथ यही है|

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है



अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है

दुष्यंत

6 comments:

रचना गौड़ ’भारती’ said...

ब्लोगिंग जगत में स्वागत है
बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने।
लगातार लिखते रहने के लि‌ए शुभकामना‌एं
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
http://www.rachanabharti.blogspot.com
कहानी,लघुकथा एंव लेखों के लि‌ए मेरे दूसरे ब्लोग् पर स्वागत है
http://www.swapnil98.blogspot.com
रेखा चित्र एंव आर्ट के लि‌ए देखें
http://chitrasansar.blogspot.com

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर said...

very good, narayan narayan

वन्दना अवस्थी दुबे said...

दुष्यंत कुमार मेरे भी पसंदीदा हैं...शुभकामनायें.

AAKASH RAJ said...

आपका हिंदी ब्लॉग जगत में स्वागत है ............

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" said...

बहुत ही सुन्दर रचना......शुभकामनाऎं

SURESH said...

आप सभी का धन्यवाद्. क्षमा करे,रचना मैंने नहीं लिखी है. कविता महानतम कवी दुष्यंत कुमार जी की है, उनकी पंक्तिया मेरे लिए हमेशा से प्रेरणा का स्त्रोत रही है

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The greatness of art is not to find what is common but what is unique.

Rankawat Suresh

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