जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है
अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है
क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है
यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है
दुष्यंत
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6 comments:
ब्लोगिंग जगत में स्वागत है
बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने।
लगातार लिखते रहने के लिए शुभकामनाएं
कविता,गज़ल और शेर के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
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कहानी,लघुकथा एंव लेखों के लिए मेरे दूसरे ब्लोग् पर स्वागत है
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very good, narayan narayan
दुष्यंत कुमार मेरे भी पसंदीदा हैं...शुभकामनायें.
आपका हिंदी ब्लॉग जगत में स्वागत है ............
बहुत ही सुन्दर रचना......शुभकामनाऎं
आप सभी का धन्यवाद्. क्षमा करे,रचना मैंने नहीं लिखी है. कविता महानतम कवी दुष्यंत कुमार जी की है, उनकी पंक्तिया मेरे लिए हमेशा से प्रेरणा का स्त्रोत रही है
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